Wednesday, 12 September 2012


                                     कार्टून कांड 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस कोई नई नहीं है लेकिन हालिया दिनों में यह मुद्दा गरमाया कार्टून विवाद के बाद | मुंबई में कार्टून अगेंस्ट करप्शन नाम के संगठन के कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी ने कुछ कार्टून बनाये और उन पर देशद्रोह का मुक़दमा लगा उन्हें जेल में डाल दिया गया | चारों और बबाल मच गया सड़क से लेकर फेसबुक तक असीम के समर्थन में लोग उतरे  यहाँ तक कि भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भी उनकी गिरफ्तारी का विरोध किया | आख़िरकार सरकार को झुकना पड़ा और असीम को जेल से रिहा करना पड़ा और उनपर लगी धाराओं को भी हटाया जायेगा | यहाँ एक बात गौर करने की है जिस आज़ादी और स्वतंत्रता  के लिए जंग लड़ी जा रही है क्या उसका दुरपयोग नहीं किया जा रहा | असीम ने जो कार्टून बनाये वो किसी भी रूप में लोकतान्त्रिक नहीं है |  जो संविधान आपको नागरिक होने के नाते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है उसी संविधान पर असीम ने अपने कार्टून में कसाब को मूतता दिखाया है | जिस देशभक्ति की बात वो कर रहे हैं उसी भारत माता के बलात्कार का भी कार्टून इसमें शामिल है | वर्तमान व्यवस्था और चारों तरफ फैले भ्रष्टाचार से सिर्फ अकेले असीम ही परेशान नहीं हैं और न ही वह अकेले ऐसे शख्स है जो विरोध जता सकते है यह रोष और गुस्सा आज देश के प्रत्येक जागरूक नागरिक के अन्दर है लेकिन क्या उसे ज़ाहिर करने का यही एक तरीका है ,अगर हाँ तो मैं इसके खिलाफ हूँ | असीम ने जिस मकसद और भावनाओं को उजागर करने के लिए यह कार्टून बनायें मैं उनसे सहमत हो सकता हूँ लेकिन उनके कार्टून किसी भी रूप में एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं है | सरकार ने भी इस पूरे मामले में जल्दबाजी दिखाई और उनपर देशद्रोह का मुकदमा जड़ दिया और ये भूल गई हम देशद्रोहियों को अपने जेलों में बंद करके पकवान खिला रहे हैं |

एक बात हम सबको याद रखनी चाहिये कि किसी तंत्र के खिलाफ लड़ाई तभी लड़ी जा सकती है जब आपका अपना पक्ष मज़बूत हो | यहाँ तो मामला ही उलट गया जिन अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी जानी है आप उन्हीं के प्रतीकों के अपमान पर उतर आये अब आपको आखिर न्याय देगा कौन वह संविधान जिस पर..या फिर वह देश ? सवाल बहुत है और इनका बेहतर जबाब भी हम खुद ही खोज सकते हैं | 

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