Saturday, 10 November 2012

इन दावों में कितना दम 


केजरीवाल जिस तरह एक के बाद एक खुलासे कर रहे हैं मुझे लगता हैं ये गलत है । इससे न सिर्फ उन खुलासों की विश्वसनीयता कटघरे में आती है बल्कि इससे उनका महत्व भी ख़त्म हो जा रहा है । उनके खुलासे अब केवल प्राइम टाइम पर होने वाली 'बहस' का विषय भर निर्धारित कर पा रहे हैं । क्या हुआ वाड्रा ,खुर्शीद ,अनिल अंबानी और गडकरी का ? और आगे भी क्या होने वाला है | इस देश में सबके पास समस्याओं की लंबी लिस्ट है । यहाँ सबकी अपनी अलग-अलग तरह की समस्याएं हैं फिर चाहे वो कोई भी हो । भ्रष्टाचार ,महँगाई ,कालाधन के खिलाफ शायद ही कभी पहले इतनी मजबूती से लड़ाई लड़ी गई हो जितना पिछले दो सालों के घटनाक्रम में हुआ है ।
 
                                                                                                                                                                                       देश में इन समस्याओं को लेकर एक आम धारणा बनी है । उसका श्रेय बेशक अन्ना ,केजरीवाल जैसे लोगों को जाता है । निश्चित तौर पर इनके आन्दोलनों ने आम आदमी की मूक संवेदनाओं और रोष को एक आवाज दी है । लेकिन क्या अब इनकी मंशा शक के दायरे में नहीं आती , सबको टीवी पर आकर भ्रष्ट कहने से आखिर क्या साबित होता है ।आप ने एक खुलासा किया उसके बाद एक और नया खुलासा , इससे आम आदमी की सोच पर कथित भ्रष्ट नाम को लेकर कोई असर हुआ । आपके खुलासे से उसे कोई सजा हुई ,या सिर्फ मीडिया में कुछ मुद्दा भड़का फिर शांत हो गया । केजरीवाल अब कोई सामाजिक कार्यकर्ता तो हैं नहीं वह भी अब एक राजनेता के तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर चुकें हैं । अब उनके हर बयान और खुलासे के राजनीतिक मायने निकले जाएंगे और पलटवार भी होगा । ऐसे में उनका हर कदम उनके आलोचकों को उन्हें घेरने का मौका देगा । उनके विपक्षी कह रहे हैं कि केजरीवाल केवल अब सनसनी फैला रहे हैं ,उनके पास बस आरोप हैं उन्हें साबित का माद्दा नहीं है । तो क्या अब केजरीवाल भी बाकी नेताओं की तरह बयानबाजी पर उतर आये है या उनके पास कोई पुख्ता दलीलें है । आप इस देश के नागरिक हैं और आपको अब शायद देश की भ्रष्ट सरकार में विश्वास न रहा हो लेकिन उस न्यायपालिका का तो ख्याल करिए । उसका दरवाजा तो आखिर खटखटा ही सकते है और यदि नहीं तो शायद आप खुद को यहाँ का 'नागरिक' कहने का हक भे खो देते हैं । दुष्यंत कुमार ने कहा है कि ''सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए''। तो क्या कुछ सूरत बदलती दिख रही है या फिर सिर्फ हंगामा मच रहा है । इसका जबाब हमें खुद तलाशना पड़ेगा ।


1 comment:

  1. न्याय पालिका पर तो हम सभी को जाने अनजाने में, चाहते हुए भी और न चाहते हुए भी विश्वास तो करना ही पड़ेगा, लेकिन आपके हिसाब से अरविंद को भी उसी न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना चाहिए जिसने आजतक किसी नेता को दोषी ठहराते हुए सजा नहीं सुनाई???

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