Friday, 16 November 2012


दिवाली दिल से ..

बड़े दिनों बाद आज फेस को बुक किया ,यहाँ तो दिवाली के बाद का धुंआ ही बचा है लगता है बड़े धूमधाम से फेसबुक पर दिवाली मनी है |
लेकिन ...
मेरे गाँव की दिवाली आज भी शांत है । न पटाखे हैं ,न फुलझड़ियाँ। यहाँ दिवाली के कुछ अलग ही मायने हैं जो शहरों की रौनक से कहीं से मेल नहीं खाते । जहाँ शहरों में बाजार सजे पड़े हैं और खरीददारों को खुद में समा लेने के लिए आतुर हैं । उसके दूसरे तरफ यहाँ सिर्फ खुशियाँ हैं वो भी बड़ी सादगी के साथ और इनमें कोई आकर्षण भी नहीं है । दूर-दराज़ दिल्ली,गुजरात जैसे प्रदेशों में काम की तलाश में गए लोग अपने घर लौट आये हैं दिवाली मानाने । पता नहीं क्यों उन बड़े शहरों की बड़ी से चकाचौंध भी उन्हें रोक पाने में कामयाब न हो सकी । ये सब अपनी जान जोखिम में डालकर लटकते-पटकते आखिर अपने घर आ ही पहुंचे हैं। ये लोग भी शहरों की थोड़ी-बहुत चकाचौंध अपने छोटे से झोले में भर लायें हैं । बबलू भईया दिल्ली से लाइट वाले लक्ष्मी-गणेश जी लायें हैं लेकिन यहाँ आजकल दिन का सप्ताह चल रहा है तो उनकी लाइट इस दिवाली शायद ही जल पाए । चाइनीज़ झालरों की गावों में भी बड़ी डिमांड है लगता है कि चाइना के सरकार से ज्यादा हमारे गाँव के साथ अच्छे संबंध हों । ये संबंध शायद यूपी सरकार को पसंद नहीं है तभी तो दिवाली भी यहाँ अँधेरे में ही मनाई जाती है दलील है कि ये सपाइयों का इलाका नहीं है । गावों की दिवाली शायद इको-फ्रेंडली है तभी तो यहाँ पटाखे नहीं चलाए जाते जो बात सरकार तमाम तरह के विज्ञापनों से समझाने की कोशिश कई सालों से करती आ रही है वह गावं वाले बिना विज्ञापन देखे ही समझ गए । दिवाली साल  भर का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है और हर जगह इसे अपने -अपने ढंग से मनाया जाता है । शहरों की दिवाली हमारे गावों से कुछ अलग है और अलग हैं उसे मनाने के तरीके भी लेकिन उसका उद्देश्य केवल एक है प्यार और खुशियाँ बांटना |


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