कितना सीखा
आज बाबरी विध्वंस के बीस साल पूरे हो गए हैं । अब हमें बीते दौर की परिस्थितियों से बहुत कुछ सीख मिली है । साम्प्रदायिक ताकतें अब खुद अपने हथियार डालने पर आमादा हैं । जो तब इन सबके लिए अपना झंडा बुलंद किये हुए थे अब वह खुद अपने लिए झंडा तलाश रहे हैं । आज भी अयोध्या में इस दिन सुरक्षा चाक-चौबंद कर दी जाती है कि कहीं वहां कोई अप्रिय घटना न घाट जाए । वहां के स्थानीय निवासियों ने न तब वहां हिंसा बरपाई थी न आज वह इस माहौल के पक्षधर हैं । वहां जो भी कुछ हुआ वो बाहरी ताकतों के प्रभाव से हुआ । बाहरी तत्वों ने उस कृत्य के तले कई और तरह की भी वारदातों को अंजाम दिया जिनका ज़िक्र कम ही मिल पाता है । सरकारें बदली ,माहौल बदला लेकिन क्या सोच अब भी वहीँ की वहीँ है । बीतें दिनों उस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों में से एक हिंदूवादी नेता का मुंबई निधन हुआ । अब उनके समर्थक मुंबई के शिवाजी पार्क में अपने नेता की स्मारक बनाने के जिद पकड़े हुए हैं । मुंबई सरकार ने उस वक़्त समय की नजाकत को समझते हुए दिवंगत नेता का अंतिम संस्कार शिवाजी पार्क में करने की अनुमति तो दे दी लेकिन तब सरकार को ये नहीं पता था कि शिवसेना स्थाई रूप से वहां उनकी स्मारक बनाए जाने की मांग कर बैठेगी । देश में स्मारकों और मुर्तिओं की राजनीति कोई नई नहीं है समय -समय पर इनका जिन्न बोतलों से निकलकर हल्ला करता रहता है । ऐसा मालूम होता है कि देश में शायद जिन्दा लोगों से ज्यादा अहमियत ये मूर्तियाँ रखती है । देश में मंदिर,मस्जिद,मूर्तियों,स्मारको ं की राजनीति हमेशा से होती आई है और जनता लगातार इन शिगूफ़ों का शिकार हुई है । हमने इन सब से कुछ सबक लिया ही नहीं या हम सबक लेना ही नहीं चाहते है । आखिर नुकसान मानवता का ही हुआ है और कीमत भी आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है । आगे कितने तैयार है हम ये शायद हमें खुद सोचना पड़ेगा ।

well written......dear
ReplyDeletehme in sab baaton se upr sochna pdega.