Monday, 25 March 2013

            

     बदलाव के दौर से गुजर रही है भारतीय क्रिकेट टीम  

         

        भारतीय क्रिकेट टीम ने जिस तरह से हालिया सीरीज में आस्ट्रेलिया का सफाया किया उसे देखना क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक सुखद अनुभव रहा होगा । पिछले दौरों मिली करारी हार के बाद इस जीत के मायने और भी बढ़ जातें हैं वह भी आस्ट्रेलिया जैसी दिग्गज टीम के खिलाफ यह जीत वाकई मजेदार है ।  इस पूरी सीरीज में हमारी टीम ने अपने साझा प्रदर्शन के बलबूते यह कारनामा किया । बल्लेबाजी ,गेंदबाजी के आलावा  कप्तानी में भी हम विपक्षी से बीस दिखे । 

अश्विन मैन द ऑफ सीरीज रहे  
        टीम में सहवाग ,गंभीर ,जहीर जैसे दिग्गज भले ही न हों फिर भी कुछ युवा खिलाड़ी  इस सीरीज की खोज रहे हैं । शिखर धवन ने सीरीज में मिले मौके को जिस तरह भुनाया वह उनकी अपार प्रतिभा और कड़ी मेहनत को दर्शाता है । अपने पहले ही मैच में धमाकेदार शतक से आगाज करना कोई आसान काम नहीं था । पुजारा ने भी बेहतरीन प्रदर्शन कर अपनी दावेदारी मजबूत की है पुजारा शीर्ष क्रम में टीम की मजबूत कड़ी बनकर उभरे है । सीरीज के हीरो रहे अश्विन ने यह साबित कर दिया कि वे भारतीय गेंदबाजी की अगुवाई करने को तैयार हैं । सीरीज में 29 विकेट लेकर इस फिरकी गेंदबाज ने कंगारुओं की कमर तोड़ दी । रवींद्र जडेजा ने गेंद और बल्ले दोनों से सबको प्रभावित किया ,कोटला में जडेजा जीत के हीरो भी  रहे । 

अपने पहले हे टेस्ट में जड़ा तूफानी शतक 
         भारतीय टीम अभी बदलाव के दौर से गुजर रही है । यहाँ वही टिकेगा जो मजबूती से अपनी दावेदारी पेश करने में सफल होगा । पिछले मैचों में सहवाग को बाहर  का रास्ता दिखाकर चयनकर्ताओं ने इस बात पर अपनी मुहर भी लगा दी है । आस्ट्रेलिया के खिलाफ हमारे युवा खिलाड़ियों ने जिस तरह का प्रदर्शन किया है उससे एक बात साफ़ है कि यही देश में क्रिकेट का भविष्य तय करने जा रहे हैं  । सचिन ,धोनी,सहवाग के बाद अब हमारी निगाहें विराट ,धवन ,पुजारा ,अश्विन को खोजती नजर आती हैं । 

        पिछले दिनों जब कुंबले ,द्रविड़ ,लक्ष्मण ने क्रिकेट को अलविदा कहा तब हम इनके विकल्प तलाशने में जुट गए । मौजूदा युवा खिलाड़ी अनुभव के आधार पर भले ही इन महान खिलाड़ियों से कमतर हों लेकिन प्रतिभा और जीवटता इनमें कूट -कूट कर भरी है ,बस इन्हें मौकों  की तलाश रहती है । 

Saturday, 23 February 2013


'हैप्पी 100 हरभजन'
 
हरभजन के सितारे भले ही अभी गर्दिश में क्यों न हो लेकिन इस खिलाड़ी ने कई बार देश को गर्व करने के मौके दिए है । अपना सौवां टेस्ट मैच खेल रहे हरभजन की खासियत है कि वो विकेट गुच्छों में लेते हैं जिस दिन भज्जी की फिरकी चलती है उस दिन विरोधी टीम ताश के पत्तों की तरह ढहती नजर आती है । अपने टेस्ट कैरियर की शरुआती दिनों में भज्जी टीम के नियमित गेंदबाजों में शामिल नहीं थे क्योंकि तब कुंबले टीम के स्पिन अटैक की अगुआई करते थे । टीम में मिले मौकों को भुनाते हुए भज्जी आगे बढ़े और 400 विकटों का पहाड़ जैसा आकड़ा भी पार किया ।
'
टर्बनेटर के नाम से मशहूर भज्जी 100 टेस्ट खेलने वाले देश के दसवें खिलाड़ी हैं । मौजूदा भारतीय खिलाड़ियों में भज्जी के अलावा यह रिकार्ड सचिन और सहवाग के नाम है । आस्ट्रेलिया के खिलाफ हरभजन का रिकार्ड और भी बेहतर है 2001 का वह कोलकाता टेस्ट शायद ही कोई खेल प्रेमी भुला पाया हो जब हरभजन के 13 विकटों की मदद से भारत ने फ़ॉलोआन के बाद आस्ट्रेलिया को हराया था । उस पूरी सीरीज में भज्जी ने 32 विकेट झटके थे और 'मैन आफ द सीरीज' भी रहे । एक दौर ऐसा भी था जब इस फिरकी गेंदबाज ने अपने परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए क्रिकेट छोड़कर विदेश में ट्रक चलाने का फैसला कर लिया था । लेकिन शायद कुदरत को कुछ और ही मंजूर था और वो आज हमारे सामने है ।


'हरभजन टेस्ट क्रिकेट में हैट्रिक, लेने वाले
पहले भारतीय गेंदबाज है
बीते कुछ सालों में भज्जी की गेंदबाजी में शायद वो पैनापन न नजर आता हो लेकिन यह खिलाड़ी थक कर हार मानने वालों में से कतई  नहीं है । मौजूदा आस्ट्रेलिया दौरा भज्जी की अग्निपरीक्षा साबित हो सकता है जब युवा गेंदबाजों की लम्बी फौज टीम में आने के लिए आतुर खड़ी है तब इस अनुभवी खिलाड़ी को अपना दम-ख़म दिखाना ही पड़ेगा । ये दौर टीम में बदलावों के लिए जाना जायेगा अभी हाल ही में राहुल द्रविड़ ,लक्ष्मण ने क्रिकेट को अलविदा कहा है और सचिन वनडे  से पहले ही संन्यास ले चुके हैं इस दौर में किसी खिलाड़ी बिना बेहतर प्रदर्शन किए टीम में टिक पाना मुश्किल है । कंगारू टीम शुरू से ही भज्जी का पसंदीदा शिकार रही है इसे अपने घर में हराना भज्जी  की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि वह दोबारा से टीम में अपना खोया हुआ स्थान प्राप्त कर सकें । 



Wednesday, 16 January 2013




                         नेता ही नहीं 'लीडर' भी 
अटल बिहारी वाजपेयी ,भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम जिसने सदैव दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम किया। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने जिसे भारतीय राजनीति का ‘भीष्म पितामाह’ कहा तथा भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता ने जिसे ‘युग पुरुष’ की संज्ञा दी है । भारतीय राजनीति में कुछ ही नाम ऐसे हैं जिनका राजनीतिक जीवन बेदाग रहा है और उन्हें चिरकालीन समय तक उनके योगदान के लिए याद किया जाएगा अटल जी उनमें अग्रणी हैं।

अटल जी -एक प्रखर वक्ता 
     25 दिसंबर 1925 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल जी बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । कॉलेज का दिनों से ही राजनीति में सक्रीय भूमिका निभाई और 19 ग्वालियर में छात्र संगठन के उपाध्यक्ष भी चुने गए । पहले वकालत फिर पीएच.डी.की पढ़ाई छोड़ कर अटल जी ने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाया । उन्होने लखनऊ से प्रकाशित राष्ट्रधर्म ,स्वदेश, पाँचजन्य और  दिल्ली से प्रकाशित वीर अर्जुन दैनिक पत्र का संपादन भी किया । राजनेता से पहले अटल जी को एक पत्रकार और कवि के रुप में जाना जाता है ।

राजनीतिक जीवन
 अटल जी कॉलेज के दिनों से ही राजनीति में सक्रीय रहे हैं। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भारतीय जनसंघ का गठन किया जो राजनीतिक विचारधारा वाला दल था। भारतीय जनसंघ का जन्म संघ परिवार की राजनीतिक संस्था के रूप में हुआ, जिसके अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। अटल जी उस समय से ही इस संस्था के संगठनात्मक ढाँचे से जुड़ गए। तब वह अध्यक्ष के निजी सचिव के रूप में दल का कार्य देख रहे थे। इस कारण उन्हें जनसंघ के सबसे पुराने व्यक्तियों में एक माना जाता है। भारतीय जनसंघ ने 

नेता ही नहीं 'लीडर' भी 
सर्वप्रथम 1952 के आम चुनावों में भाग लिया लेकिन चुनावों में भारतीय जनसंघ को कोई विशेष कामयाबी प्राप्त नहीं हुई  1953 में जब डॉ. मुखर्जी की जेल में ही मृत्यु हो गई। तब भारतीय जनसंघ का काम अटल जी प्रमुख रूप से देखने लगे।1957 के आम चुनावों में भारतीय जनसंघ अटल जी के नेतृत्व चार स्थानों पर विजय प्राप्त हुई। अटल जी पहली बार बलरामपुर सीट से विजयी होकर लोकसभा में पहुँचे। उसके बाद लगातारअटल जी नौ बार लोकसभा और दो राज्यसभा में चुनकर गए। 1977 में छठी लोकसभा में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब उन्हें देश का विदेश मंत्री बनाया गया । आपातकाल के दौरान अटल जी जेल में रहे ।1980 में जब जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ तब अटल जी पार्टी के सबसे शीर्ष नेताओं में से एक थे । अटल जी पहली बार 16 मई 1996 को तेरह दिनों तक प्रधानमंत्री रहे ।दूसरी बार अटन जी अप्रेल 1999 में 13 माह के लिए प्रधानमंत्री रहे और तीसरी बार उन्हें अक्टूबर 1999 में प्रधानमंत्री बनाया गया 2004 में अटल जी ने अपने कार्यकाल को पूरा किया । अटल जी के पास 40 वर्षों से ज्यादा का संसदीय अनुभव है जो राजनीति में उनकी अपार ख्याति को दर्शाता है।



क्यों याद किया जाता है अटल जी को
·         श्री अटल जी ने संतुलित विदेश नीति का पालन करते हुए अपनी परमाणु नीति को स्पष्ट किया। अमेरिका और उसके मित्र देशों ने 11 मई 1198 को हुए पोखरण परमाणु परीक्षण पर आँखें अवश्य दिखाई लेकिन अटलजी ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अगला परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। वह परमाणु बम का उपयोग तभी करेगा जब उसके विरुद्ध ऐसा किया जाएगा। भारतीय परमाणु कार्यक्रम चीन तथा पाकिस्तान के विरोधी रवैये को देखते हुए बनाया गया और सारी दुनिया भी भारत के इस भय को समझती थी।
·         आर्थिक विकास के लिए अटलजी ने 'स्वर्णिम चतुर्भुज' योजना का आरम्भ किया। इसके अंतर्गत वह देश के महत्वपूर्ण शहरों को लंबी-चौड़ी सड़कों के साथ जोड़ना चाहते थे । इसका अधिकांश कार्य अटलजी के कार्यकाल में पूर्ण हुआ। इससे जहाँ आम व्यक्ति की यात्रा सुविधाजनक हुई, वहीं व्यापारिक और क़ारोबारी गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिला।

·         अटलजी ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की दिशा में सदैव पहल की,यद्यपि पाकिस्तान ने कभी भी अपने वादों को पूर्ण नहीं किया। कारगिल युद्ध इसका स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने पाकिस्तान के सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ़ से भी बातचीत की थी। अटल जी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ को आगरा में शिख़र वार्ता के लिए आमंत्रित किया।

·         अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में 'ब्रेन ड्रेन' ( युवा प्रतिभाओं में विदेश गमन की अभिरुचिबताई। उन्होंने युवाओं का आह्वान को रोकने की ज़रूरत ( किया कि वे मातृभूमि की सेवा पर ध्यान दें।
·         परमाणु बम बना लेने के कारण अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन अटलजी ने प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए भारत को स्वावलम्बी राष्ट्र बनाने की दिशा में कार्य किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया कि भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत है और उन्हें आर्थिक प्रतिबंधों की कोई भी परवाह नहीं है।
·         अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिटंन के भारत आगमन पर अमेरिका के साथ भारतीय सम्बन्धों को सुधारने की दिशा में कार्य किया गया। अटलजी ने पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ की रिहाई के लिए बिल क्लिंटन से वार्ता की ताकि पड़ोसी देश में प्रजातंत्र की हत्या न हो सके। इस साझा प्रयास से ही नवाज शरीफ़ की रिहाई सम्भव हो सकी।

·         अयोध्या स्थित 'रामजन्म भूमि' पर मन्दिर बनाए जाने का भी मुद्दा था। यद्यपि अटल जी उस सीमा तक भाजपा के साथ माने जाते हैं, जहाँ तक हिन्दू राष्ट्र का सवाल आता है, लेकिन वह जन भावनाएँ भड़काने की नीति के समर्थक कभी भी नहीं रहे।
·         4 अक्टूबर 1977 को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में हिन्दी में सम्बोधन दिया। इसके पूर्व किसी भी भारतीय नागरिक ने राष्ट्रभाषा का प्रयोग इस मंच पर नहीं किया था। उनके इस भाषण को पूरी दुनिया में सराहा गया ।
·         अटल जी बंग्लादेश के साथ भी गंगाजल के वितरण पर समझौते की दिशा में बढ़े। उन्होंने तत्कालीन फ़ौजी शासक जिया-उल-हक़ से वार्तालाप के दौरान 'फ़रक्का-गंगाजल' बंटवारे का मसौदा तय किया। इसके अतिरिक्त भारत और पाकिस्तान के मध्य रेल सेवा की बहाली भी तय की गई।
उपरोक्त उदाहरणों यह बात साफ तौर पर सिद्ध होती है कि अटल जी का भारतीय राजनीति में समग्र योगदान है ।देश की राजनीति में आज के समय में जब राजनेता हर तरह से अपनी छवि खोते जा रहे हैं अटल जी जैसे नेतीओं की जरुरत है जो देश की चरमराती लोकतांत्रिक व्यवस्था के खेवनहार बन सकें |    
धन्यवाद ... 
''समग्र अटलजी परियोजना'' द्वारा पुरस्कृत निबन्ध ।

 विषय - भारतीय राजीनीति  में अटल जी का योगदान 




Thursday, 6 December 2012

                                  कितना सीखा 

आज बाबरी विध्वंस के बीस साल पूरे हो गए हैं । अब हमें बीते दौर की परिस्थितियों से बहुत कुछ सीख मिली है । साम्प्रदायिक ताकतें अब खुद अपने हथियार डालने पर आमादा हैं । जो तब इन सबके लिए अपना झंडा बुलंद किये हुए थे अब वह खुद अपने लिए झंडा तलाश रहे हैं । आज भी अयोध्या में इस दिन सुरक्षा चाक-चौबंद कर दी जाती है कि कहीं वहां कोई अप्रिय घटना न घाट जाए । वहां के स्थानीय निवासियों ने न तब वहां हिंसा बरपाई थी न आज वह इस माहौल के पक्षधर हैं । वहां जो भी कुछ हुआ वो बाहरी ताकतों के प्रभाव से हुआ । बाहरी तत्वों ने उस कृत्य के तले कई और तरह की भी वारदातों को अंजाम दिया जिनका ज़िक्र कम ही मिल पाता है । सरकारें बदली ,माहौल बदला लेकिन क्या सोच अब भी वहीँ की वहीँ है । बीतें दिनों उस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों में से एक हिंदूवादी नेता का मुंबई निधन हुआ । अब उनके समर्थक मुंबई के शिवाजी पार्क में अपने नेता की स्मारक बनाने के जिद पकड़े हुए हैं । मुंबई सरकार ने उस वक़्त समय की नजाकत को समझते हुए दिवंगत नेता का अंतिम संस्कार शिवाजी पार्क में करने की अनुमति तो दे दी लेकिन तब सरकार को ये नहीं पता था कि शिवसेना स्थाई रूप से वहां उनकी स्मारक बनाए जाने की मांग कर बैठेगी । देश में स्मारकों और मुर्तिओं की राजनीति कोई नई नहीं है समय -समय पर इनका जिन्न बोतलों से निकलकर हल्ला करता रहता है । ऐसा मालूम होता है कि देश में शायद जिन्दा लोगों से ज्यादा अहमियत ये मूर्तियाँ रखती है । देश में मंदिर,मस्जिद,मूर्तियों,स्मारकों की राजनीति हमेशा से होती आई है और जनता लगातार इन शिगूफ़ों का शिकार हुई है । हमने इन सब से कुछ सबक लिया ही नहीं या हम सबक लेना ही नहीं चाहते है । आखिर नुकसान मानवता का ही हुआ है और कीमत भी आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है । आगे कितने तैयार है हम ये शायद हमें खुद सोचना पड़ेगा । 

Friday, 16 November 2012


दिवाली दिल से ..

बड़े दिनों बाद आज फेस को बुक किया ,यहाँ तो दिवाली के बाद का धुंआ ही बचा है लगता है बड़े धूमधाम से फेसबुक पर दिवाली मनी है |
लेकिन ...
मेरे गाँव की दिवाली आज भी शांत है । न पटाखे हैं ,न फुलझड़ियाँ। यहाँ दिवाली के कुछ अलग ही मायने हैं जो शहरों की रौनक से कहीं से मेल नहीं खाते । जहाँ शहरों में बाजार सजे पड़े हैं और खरीददारों को खुद में समा लेने के लिए आतुर हैं । उसके दूसरे तरफ यहाँ सिर्फ खुशियाँ हैं वो भी बड़ी सादगी के साथ और इनमें कोई आकर्षण भी नहीं है । दूर-दराज़ दिल्ली,गुजरात जैसे प्रदेशों में काम की तलाश में गए लोग अपने घर लौट आये हैं दिवाली मानाने । पता नहीं क्यों उन बड़े शहरों की बड़ी से चकाचौंध भी उन्हें रोक पाने में कामयाब न हो सकी । ये सब अपनी जान जोखिम में डालकर लटकते-पटकते आखिर अपने घर आ ही पहुंचे हैं। ये लोग भी शहरों की थोड़ी-बहुत चकाचौंध अपने छोटे से झोले में भर लायें हैं । बबलू भईया दिल्ली से लाइट वाले लक्ष्मी-गणेश जी लायें हैं लेकिन यहाँ आजकल दिन का सप्ताह चल रहा है तो उनकी लाइट इस दिवाली शायद ही जल पाए । चाइनीज़ झालरों की गावों में भी बड़ी डिमांड है लगता है कि चाइना के सरकार से ज्यादा हमारे गाँव के साथ अच्छे संबंध हों । ये संबंध शायद यूपी सरकार को पसंद नहीं है तभी तो दिवाली भी यहाँ अँधेरे में ही मनाई जाती है दलील है कि ये सपाइयों का इलाका नहीं है । गावों की दिवाली शायद इको-फ्रेंडली है तभी तो यहाँ पटाखे नहीं चलाए जाते जो बात सरकार तमाम तरह के विज्ञापनों से समझाने की कोशिश कई सालों से करती आ रही है वह गावं वाले बिना विज्ञापन देखे ही समझ गए । दिवाली साल  भर का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है और हर जगह इसे अपने -अपने ढंग से मनाया जाता है । शहरों की दिवाली हमारे गावों से कुछ अलग है और अलग हैं उसे मनाने के तरीके भी लेकिन उसका उद्देश्य केवल एक है प्यार और खुशियाँ बांटना |


Saturday, 10 November 2012

इन दावों में कितना दम 


केजरीवाल जिस तरह एक के बाद एक खुलासे कर रहे हैं मुझे लगता हैं ये गलत है । इससे न सिर्फ उन खुलासों की विश्वसनीयता कटघरे में आती है बल्कि इससे उनका महत्व भी ख़त्म हो जा रहा है । उनके खुलासे अब केवल प्राइम टाइम पर होने वाली 'बहस' का विषय भर निर्धारित कर पा रहे हैं । क्या हुआ वाड्रा ,खुर्शीद ,अनिल अंबानी और गडकरी का ? और आगे भी क्या होने वाला है | इस देश में सबके पास समस्याओं की लंबी लिस्ट है । यहाँ सबकी अपनी अलग-अलग तरह की समस्याएं हैं फिर चाहे वो कोई भी हो । भ्रष्टाचार ,महँगाई ,कालाधन के खिलाफ शायद ही कभी पहले इतनी मजबूती से लड़ाई लड़ी गई हो जितना पिछले दो सालों के घटनाक्रम में हुआ है ।
 
                                                                                                                                                                                       देश में इन समस्याओं को लेकर एक आम धारणा बनी है । उसका श्रेय बेशक अन्ना ,केजरीवाल जैसे लोगों को जाता है । निश्चित तौर पर इनके आन्दोलनों ने आम आदमी की मूक संवेदनाओं और रोष को एक आवाज दी है । लेकिन क्या अब इनकी मंशा शक के दायरे में नहीं आती , सबको टीवी पर आकर भ्रष्ट कहने से आखिर क्या साबित होता है ।आप ने एक खुलासा किया उसके बाद एक और नया खुलासा , इससे आम आदमी की सोच पर कथित भ्रष्ट नाम को लेकर कोई असर हुआ । आपके खुलासे से उसे कोई सजा हुई ,या सिर्फ मीडिया में कुछ मुद्दा भड़का फिर शांत हो गया । केजरीवाल अब कोई सामाजिक कार्यकर्ता तो हैं नहीं वह भी अब एक राजनेता के तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर चुकें हैं । अब उनके हर बयान और खुलासे के राजनीतिक मायने निकले जाएंगे और पलटवार भी होगा । ऐसे में उनका हर कदम उनके आलोचकों को उन्हें घेरने का मौका देगा । उनके विपक्षी कह रहे हैं कि केजरीवाल केवल अब सनसनी फैला रहे हैं ,उनके पास बस आरोप हैं उन्हें साबित का माद्दा नहीं है । तो क्या अब केजरीवाल भी बाकी नेताओं की तरह बयानबाजी पर उतर आये है या उनके पास कोई पुख्ता दलीलें है । आप इस देश के नागरिक हैं और आपको अब शायद देश की भ्रष्ट सरकार में विश्वास न रहा हो लेकिन उस न्यायपालिका का तो ख्याल करिए । उसका दरवाजा तो आखिर खटखटा ही सकते है और यदि नहीं तो शायद आप खुद को यहाँ का 'नागरिक' कहने का हक भे खो देते हैं । दुष्यंत कुमार ने कहा है कि ''सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए''। तो क्या कुछ सूरत बदलती दिख रही है या फिर सिर्फ हंगामा मच रहा है । इसका जबाब हमें खुद तलाशना पड़ेगा ।


Wednesday, 12 September 2012


                                     कार्टून कांड 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस कोई नई नहीं है लेकिन हालिया दिनों में यह मुद्दा गरमाया कार्टून विवाद के बाद | मुंबई में कार्टून अगेंस्ट करप्शन नाम के संगठन के कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी ने कुछ कार्टून बनाये और उन पर देशद्रोह का मुक़दमा लगा उन्हें जेल में डाल दिया गया | चारों और बबाल मच गया सड़क से लेकर फेसबुक तक असीम के समर्थन में लोग उतरे  यहाँ तक कि भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भी उनकी गिरफ्तारी का विरोध किया | आख़िरकार सरकार को झुकना पड़ा और असीम को जेल से रिहा करना पड़ा और उनपर लगी धाराओं को भी हटाया जायेगा | यहाँ एक बात गौर करने की है जिस आज़ादी और स्वतंत्रता  के लिए जंग लड़ी जा रही है क्या उसका दुरपयोग नहीं किया जा रहा | असीम ने जो कार्टून बनाये वो किसी भी रूप में लोकतान्त्रिक नहीं है |  जो संविधान आपको नागरिक होने के नाते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है उसी संविधान पर असीम ने अपने कार्टून में कसाब को मूतता दिखाया है | जिस देशभक्ति की बात वो कर रहे हैं उसी भारत माता के बलात्कार का भी कार्टून इसमें शामिल है | वर्तमान व्यवस्था और चारों तरफ फैले भ्रष्टाचार से सिर्फ अकेले असीम ही परेशान नहीं हैं और न ही वह अकेले ऐसे शख्स है जो विरोध जता सकते है यह रोष और गुस्सा आज देश के प्रत्येक जागरूक नागरिक के अन्दर है लेकिन क्या उसे ज़ाहिर करने का यही एक तरीका है ,अगर हाँ तो मैं इसके खिलाफ हूँ | असीम ने जिस मकसद और भावनाओं को उजागर करने के लिए यह कार्टून बनायें मैं उनसे सहमत हो सकता हूँ लेकिन उनके कार्टून किसी भी रूप में एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं है | सरकार ने भी इस पूरे मामले में जल्दबाजी दिखाई और उनपर देशद्रोह का मुकदमा जड़ दिया और ये भूल गई हम देशद्रोहियों को अपने जेलों में बंद करके पकवान खिला रहे हैं |

एक बात हम सबको याद रखनी चाहिये कि किसी तंत्र के खिलाफ लड़ाई तभी लड़ी जा सकती है जब आपका अपना पक्ष मज़बूत हो | यहाँ तो मामला ही उलट गया जिन अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी जानी है आप उन्हीं के प्रतीकों के अपमान पर उतर आये अब आपको आखिर न्याय देगा कौन वह संविधान जिस पर..या फिर वह देश ? सवाल बहुत है और इनका बेहतर जबाब भी हम खुद ही खोज सकते हैं |